HINDI KAHANIYAAN : MORAL STORIES IN HINDI महत्वपूर्ण कौन? (सुमेर की कहानियाँ) कहानी-13

महत्वपूर्ण कौन?


आज सुमेर की HINDI KAHANIYA में आप पढ़ेंगे MORAL STORIES IN HINDI जो की FUNNY STORIES IN HINDI भी है।
                                      राजा सूर्यभान का दरबार लगा हुआ था। बात चल रही थी राज्य का विकास कैसे हो ? राज्य के विकास में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कौन है ?  ऐसा कौन है जो राज्य के भलाई के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है। इसी बारे में बात चल रही थी। हर कोई अपनी अपनी बात कह रहे थे।

                                     एक दरबारी ने कहा," महाराज राज्य की भलाई के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है उस राज्य का राजा।  किसी भी राज्य का विकास राजा पर निर्भर करता है। वो कितना अच्छा है। वो अपराधियों को कैसे दंड देता है। गरीबो की कैसे सहायत़ा करता है। लोगो के अधिकारों की कैसे रक्षा करता है।  कैसे वो अपने राज्य को पडोसी राज्यों के हमले से बचाता है। राज्य के अन्दर कैसे शांति रखता है। कैसे सभी लोगो को अपने कामो से खुश रखता है। जब राजा ऐसा करेगा और वो अच्छा होगा तो ही राज्य का विकास होगा। इसलिए राजा किसी राज्य के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।"

                                   राजा को ये बात सही लगी, लेकिन राजा ने कहा," किसी भी राज्य के विकास के लिए राजा तो जिम्मेदार होता ही है लेकिन इस बात का क्या भरोसा की राजा अच्छा ही होगा ? ऐसा हो सकता है की राजा दुष्ट और अत्याचारी हो तो।"


                                  राजकुमारी ने कहा," राज्य के विकास के लिए सबसे ज़रूरी हैं साधारण जनता। किसान, लुहार, बढई, चित्रकार, मजदूर, जुलाहा, नाई, कुम्हार, सुनार आदि। अगर ये कड़ी मेहनत करके अपना काम न करें तो किसी भी राज्य का विकास नहीं हो सकता। तो मेरे हिसाब से किसी राज्य के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण यही लोग होते हैं।"

                                  राजा को ये बात सही नहीं लगी। उन्होंने राजकुमारी की बात को काटते हुए कहा," साधारण जनता अनपढ़ होती है। वो नहीं जानती की राज्य का विकास कैसे होगा। इसीलिए एक राजा सिर्फ इन लोगो पर निर्भर होकर अपने राज्य का विकास नहीं कर सकता, क्योंकि राजा को पढ़े लिखे लोगो की ज़रुरत होती है। इसलिए उसे मंत्री और ब्राह्मण लोगो की ज़रुरत पड़ती है राज्य के विकास के लिए। इसलिए तुम्हारी ये बात भी उतनी सही नहीं लगती।"

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                                 सेनापति ने अपनी राय रखते हुए कहा," मेरा मानना है की राज्य के विकास के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी होता है सेनापति क्योंकि अगर वो सेना को सही से नहीं देखेगा उसका ख्याल नहीं रखेगा तो पडोसी देश उस राज्य पर कब्ज़ा कर लेंगे।"

                                 राजा ने उनकी बात को गलत साबित करते हुए कहा," यदि राजा सेना पर और सेनापति पर अपना नियंत्रण नहीं रखेगा तो सेना ही राजा को मार देगी इसलिए आपकी ये बात भी गलत है।"

                               एक दरबारी ने कहा,"राज्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसके किले हैं क्योंकि वही राज्य को हमले से बचाते हैं।"

राजा ने जवाब दिया,"नहीं उससे ज्यादा अच्छे और ज़रूरी तो राज्य के बहादुर लोग होते हैं।जो युद्ध लड़ते हैं।"

राजगुरु ने कहा," सबसे ज्यादा ज़रूरी किसी राज्य के लिए उस राज्य के ब्राहमण होते हैं।"

इस बात को सुनकर राजा ने सुमेर की तरफ देखते हुए कहा," तुम्हारा इस विषय पर क्या कहना है।"

                               सुमेर ने कहा,"मेरे हिसाब से अच्छा इंसान चाहे वो ब्राहमण हो या किसी और जाति का हो वो राज्य को लाभ ही देगा और वही राज्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। इसी तरह हर एक जाति में बुरे लोग और अच्छे लोग मिलेंगे। इसलिए ये कहना की ब्राहमण ही राज्य को लाभ देगा गलत है। कभी कभी ऐसा भी हो सकता है की कोई ब्राहमण धन के लालच में राज्य का अहित कर दे।"
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                                ये सुनना था की राजगुरु गुस्सा हो गए। उन्होंने कहा," तुम राज्य के ब्राहमण पर आरोप लगा रहे हो। राज्य का कोई भी ब्राहमण अपने राज्य को हानि पहुचाने के बारे में सोच भी नहीं सकता। ब्राहमण को कभी धन का लालच होता ही नहीं। ये मेरा दावा है। और अगर ऐसा है तो तुम साबित करके दिखाओं।"

                                सुमेर ने उत्तर देते हुए कहा,"मै ये साबित कर सकता हूँ की जो इन्सान अच्छा न हो वो ब्राहमण होकर भी धन के लालच में राज्य की हानि करा सकता है।"

                                राजा ने जब यह देखा की दरबार में कुछ ज्यादा ही बात बढ़ गयी है, तो उन्होंने दरबार को भंग कर दिया और कहा,"इस बारे में अब बात नहीं होगी।"

                              इस बात को हुए एक महीना बीत गया। सब लोग इस बात को भूल गए लेकिन सुमेर नहीं भूले। उन्हें याद था की उन्हें इसका प्रमाण देना है। एक दिन सुमेर ने राजा को अपनी योजना के बारे में बताया। राजा सुमेर की बात मान गए।
                              सुमेर गया और राज्य के सबसे मुख्य आठ ब्राहमणों के पास गया। उनसे सुमेर ने कहा,"राजा जी चांदी के बर्तन और स्वर्ण मुद्राएं देना चाहते हैं। उन्होंने दान के लिए आप आठ लोगो को चुना है। इसलिए आप लोग जल्दी चलिए।" ये सुनकर आठो ब्राह्मण बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा कि हम अभी स्नान करके आते हैं। सुमेर ने उनकी बात काटी की इतना वक़्त नहीं है की आप स्नान कर सके। ऐसा न हो की आप स्नान करते रह जायें और उधर मुहूर्त निकल जाए। मै बाकी लोगो को बुलाने जा रहा हूँ। 
                                    ब्राहमण ने कहा," रुकिए! मै सर पर पानी छिड़क लेता हूँ और कंघी कर लेता हूँ। इसे भी स्नान के बराबर ही माना जाता है। सुमेर बिना कोई उत्तर दिए वहां से चला गया बाकी सभी ब्राहमणों को बुलाने। सभी ब्राहमणों को लेकर सुमेर दरबार में पहुंचा। आठो  ब्राहमणों में से किसी ने भी स्नान नहीं किया था। राजाजी दरबार में दान करने के लिए तैयार बैठे थे।
                                     उन्हें तैयार देख ब्राहमणों की तो ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। सभी राजा के पास गए और राजाजी जैसे ही दान करने चले तभी सुमेर ने कहा,"महाराज क्षमा चाहता हूँ पर आपको बताना ज़रूरी है की इन ब्राहमणों में से किसी ने भी स्नान नहीं किया है। ये दान पाने के लिए जल्दी जल्दी चले आये हैं।"
                                    सुमेर की ये बात सुनकर राजा गुस्सा हो गए। राजा ने ब्राहमणों से पूछा," जो सुमेर कह रहा है क्या वो सच है ? " ये सुनकर तो ब्राहमणों की जान ही निकल गयी। उनके मुहं से कोई बात ही नहीं निकल रही थी। राजा गुस्से में उनको डांटने लगे और धीरे धीरे ब्राहमण जाने लगे। कुछ देर बाद सभी ब्राहमण चले गए।

                                    राजा का गुस्सा भी शांत हो गया तो सुमेर ने राजगुरु से कहा," गुरूजी आपको याद है एक महीने पहले यही बात हुई थी तो आपने कहा था की कोई भी ब्राहमण लालच में आकर राज्य की हानि नहीं करता। तो ये क्या था ?" ये सुनकर राजगुरु को सांप सूंघ गया। सुमेर ने कहा," ये ब्राहमण धन के लालच में अपना धर्म कर्म भूल गए और जल्दी से दान लेने आ गए।"

                                    इस घटना के बाद ये बात सिद्ध हो गयी की किसी राज्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसकी परिश्रमी जनता होती है। अगर जनता को अच्छा मंत्री और राजा मिले तो राज्य दिन दूनी रात चौगुनी विकास करेगा। इस बात के बाद राजगुरु को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और वो दरबार में बहुत सोच समजकर बोलने लगे।

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