HINDI KAHANIYAAN : MORAL STORIES IN HINDI मिट्टी के तरबूज (सुमेर की कहानियाँ) कहानी-12

मिट्टी के तरबूज


आज HINDI KAHANIYA के MORAL STORIES IN HINDI में आप पढ़ेंगे कहानी मिट्टी के तरबूज

                                  गर्मी ख़त्म हो चुकी थी और बरसात आ गयी थी। इस बार की गर्मी दरबार के लोगो की बहुत अच्छी गयी थी। क्योंकि इस बार उन्हें दरबार में गर्मी का अनुभव नहीं हुआ था। उसका कारण कोई और नहीं सुमेर था क्योंकि उसने दरबार में बगीचे की हवा लायी थी (कैसे लायी पढने के लिए click here)।

                                 राजा सूर्यभान का दरबार लगा था। सभी लोग बड़े खुश थे की गर्मी का मौसम चला गया। अब कोई परेशानी नहीं। उसी समय राजा के बचपन के बहुत अच्छे मित्र आ गए। राजा उनको दरबार में देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने खुद उनका स्वागत किया और उन्हें अपने खुद के निजी कक्ष में ठहराया। राजा अपने मित्र से मिलकर बहुत खुश थे। वो दोनों पूरी रात अपने बचपन के दिनों की बातें करते रहे और उन पलो को याद करके खुश होते रहे। जब रात ज्यादा हो गयी तो दोनों सोने चले गए।
                             राजा के मित्र की नज़र रात को दीवार पर लगे एक चित्र पर पड़ी, जिसमे तरबूज बने हुए थे। उसको देखकर उनके मन में ख्याल आया की ऐसे मीठे तरबूज तो देखे सालों हो गए। अगर ऐसे तरबूज खाने को मिले तो मज़ा आ जाए।
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                             अगले दिन उन्होंने ये पूरी बात दरबार में राजा के सामने कही, तो राजा ने दरबार में पूछा कौन है जो मेरे मित्र की ख्वाइश को पूरा कर सकता है। पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया क्योंकि तरबूज का मौसम जा चुका था। अब तो तरबूज मिलना भी मुश्किल था, तो मीठे तरबूज मिलने का तो सवाल ही नहीं उठता।
                               लोगो ने राजा को बताया की ये मौसम तरबूज का नहीं है। ये बात जब उनके मित्र को पता चली तो उनको भी अपनी सोच पर बुरा लगा। राजा को ये बात बुरी लगी कि उनका मित्र इतने दिन बाद आया और उसने कुछ माँगा और मैं उसे दे नहीं सका।
                                उन्होंने अगले दिन दरबार में ये बात रखी। एक दरबारी ने कहा कि महाराज नामुमकिन को मुमकिन करने वाला सुमेर है। वो ही कुछ कर सकता है राजा ने सुमेर की तरफ देखा। सुमेर ने उनके मित्र से पूरी बात जानी। तो उनके मित्र ने बताया की ऐसे मीठे तरबूज देखे ज़माने हो गए। मै ऐसे तरबूज देखना चाहता था। मैंने यही बात राजा से भी कही थी लेकिन मुझे नहीं याद था कि ये तरबूज का मौसम नहीं है।

                               सुमेर ने पूरी बात सुनी और राजाजी से कहा महाराज मुझे २ दिन का समय चाहिए। मै आपके मित्र की ख्वाइश पूरी कर दूंगा। राजा बड़े ख़ुश हुए।

                                  सुमेर एक कुम्हार के पास गया और मिट्टी के तरबूज बनाने को कहा। जिनको देखकर कोई न कह पाए की ये असली नहीं हैं।

                               दो दिन बाद दरबार लगा हुआ था। राजा और उनके मित्र सुमेर का इंतज़ार बड़े बेसब्री से कर रहे थे। तभी सुमेर दरबार में आया और उसके साथ सेवक थे, जिनके हाथ में तरबूज से भरे टोकरे थे। जिसमे एक से बढ़कर एक तरबूज थे। जिसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि ये नकली तरबूज हैं। राजाजी और उनके मित्र ने तरबूजो को देखकर तारीफों के पुल बाँध दिए।

                               राजाजी ने कहा,"अब किस बात का इंतज़ार है। इन तरबूजो को काटा जाए और खाने को दिया जाए।"

उनकी बात सुनकर सुमेर ने कहा," क्षमा करे महाराज पर इन तरबूजो को खाया नहीं जा सकता क्योंकि ये असली नहीं हैं।" जब राजाजी ने ध्यान से देखा तो पता चला की ये तरबूज तो मिटटी के हैं।

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                                              सुमेर ने कहा," महाराज आपके मित्र की ख्वाइश थी की ऐसे तरबूज देखने की न की खाने की और मैंने वो ख्वाइश पूरी कर दी।"

                                               ये बात सुनकर राजा के मित्र को हंसी आ गयी और वो हँसने लगे। उन्होंने कहा कि बिल्कुल सही कहा आपने। मैंने देखने के लिए ही कहा था। मैं देखना चाहता था की मेरे मित्र के मंत्री कितने काबिल हैं। तुम सच में बहुत बुद्धिमान हो। राजा सुमेर के इस काम से बहुत खुश हुए और ईनाम के रूप में उसे अपने गले का कीमती हार दे दिया।


शिक्षा- बुद्धिमान लोगो का साथ आपकी इज्जत बढाता है और मुर्ख लोगो का साथ आपकी बेज्ज़ती कराता है

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