LOVE STORY IN HINDI :LOVE STORY दूसरी मुलाकात By no1hindikahaniya.online


 दूसरी मुलाकात


आज आप पढ़ेंगे love stories in hindi की kahani 'दूसरी मुलाकात।'
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                   आज उससे मुलाकात हुई, जिससे दूर हुए 5 साल हो चुके थे। उससे मिलते ही जिंदगी फिर से किसी फिल्म की तरह पुराने दिनों में चली गयी। वो सभी पल जो उसके साथ बिताये थे, सभी आँखों के सामने आ रहे थे। ऐसा लग रहा था की कोई फिल्म चल रही है, आँखों के सामने।


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                मै घर आ गयी थी लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे जिंदगी अभी भी उसी ऑफिस में रुकी है, जहाँ 1 घंटे पहले उसे देखा था। वो अभी भी वैसा ही लगता था, जैसा आज के पांच साल पहले लगता था। वही भूरी आँखें और होंठो पर हल्की सी मुस्कान, पर अब उन बातों का क्या फर्क पड़ता है ?  अब वो वह तो नहीं जो पांच साल पहले हुआ करता था।


              "क्या हुआ किस ख्याल में गुम हो ?" माँ ने कहा, तो जैसे नीद से जागी। मुझे तब एहसास हुआ की अभी तक मै वैसे ही बैठी हूँ जैसे ऑफिस से आने के बाद थी। मुझे घर आये आधा घंटा हो गया है और मुझे इसका एहसास भी नहीं है। टेबल पर रखी कॉफ़ी भी ठंडी हो चुकी है, लेकिन मेरे दिल में जो ज्वालामुखी जल रही है वो तो ठंडी नहीं हुई थी। वो तो बहुत तेज़ी से जल रही थी।


                माँ बगल में बैठ गयीं, और पूछा,"क्या हुआ आज काम ज्यादा था क्या ? कुछ थकी हुई हो।" मैंने कुछ जवाब नहीं दिया, और कपडे बदलने चली गयी।


                जब वापस आई तो माँ ने कॉफ़ी फिर से गरम करके रख दी थी। उससे उठती भाप तक मुझे अंकुश की याद दिला रही थी। हाँ ऐसा ही कुछ दिन था, जब उससे पहली बार मुलाकात हुई थी। मेरा कॉलेज का पहला दिन था। बिज़नेस मैनेजमेंट की पढाई करने के लिए अपने शहर वाराणसी से दिल्ली आई थी। मै यहाँ किसी को नही जानती थी।


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                  कॉलेज से छूटने के बाद कॉफ़ी शॉप में कॉफ़ी पी रही थी। अचानक वो मेरी टेबल पर कॉफ़ी लाया और बोला,"मैडम आपकी कॉफ़ी।" मैंने एक नज़र उस पर डाली, तो ऐसा एहसास हुआ की उसे कहीं तो देखा है। वो भी जल्दी ही। मैंने सोचा, मन का वहम होगा और मैंने जल्दी से कॉफ़ी ख़त्म की, और अपने हॉस्टल आ गयी। घर से पहली बार दूर आई थी, तो घर की याद आ रही थी। ऐसा लग रहा था की जैसे मै किसी प्लेटफार्म पर खडी हूँ और सारी रेलगाड़ियाँ जा चुकी हैं, और अब पूरा सन्नाटा हो चुका है।


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                  अगली शाम फिर क्लास के बाद कॉफ़ी पीने गयी, तो मुझे फिर वो दिखाई दिया। इस बार मै खुद को रोक नहीं पायी और मैंने पूछ ही लिया," क्या मैंने कहीं आपको देखा है ?"  उसने कहा,"हम साथ पढ़ते हैं। मेरा नाम अंकुश है।"


               उस दिन से हमारी मुलाक़ात रोज़ होने लगी। घंटो बातें होने लगी, और कब वो दोस्ती प्यार में बदल गयी न मुझे पता चला न उसे।


              धीरे धीरे दिन बीतते चले गये। हमारा प्यार और बढ़ता जा रहा था। एक दिन आखिरकार उसने मुझसे कह ही दिया।


 
               वो शाम मै कभी नहीं भूल सकती। हम कॉलेज की बिल्डिंग की सबसे उपरी छत पर खड़े थे। छुट्टी हो चुकी थी तो दूर दूर तक कोई भी नहीं दिखाई दे रहा था। उसने कहा,"संजना हम पिछले 2 साल से एक अच्छे दोस्त हैं और पता नहीं मुझे क्यों ऐसा लगता है की हम सिर्फ दोस्त ही नहीं हैं। मै तुमसे प्यार करने लगा हूँ। जब तुम दूर होती हो तो अजीब सी बैचैनी होती है। अगर किसी दिन तुम नही दिखाई देती, तो वो दिन अधूरा सा लगता है।  मै तुम्हारे साथ अपनी पूरी जिंदगी बिताना चाहता हूँ।


               मै क्या कहती ?  मै तो पहले से जानती थी की मै उससे प्यार करती हूँ। मैंने कहा,"शायद मुझे इस बात से कोई इंकार नहीं होगा। फिर भी मै चाहूंगी की मै ये बात अपनी माँ से पूछ लूँ। वो भी तुम्हे अच्छे से जानती हैं।"


             अगले दिन हम दोनों माँ के सामने थे। माँ ने पूरी बात जानी और हमारे प्यार को मंज़ूरी दे दी।

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             "क्या हुआ आज कॉफ़ी नहीं पीने का इरादा है क्या ? या कोई और बात है ?" माँ ने पूछा। मैंने कहा कुछ नहीं बस ऐसे ही।


               उस रात मै सो नहीं पायी। उसका ख्याल मुझे सोने ही नहीं दिया। ऐसा लग रहा था मानो, चाँद की रौशनी शांत लहरों को फिर से परेशान कर रही हो।


               जानती हूँ की पिछले 5 सालो में ऐसा कोई दिन नहीं गया, जब उसका ख्याल नहीं आया हो, लेकिन आज उसे सामने देखने के बाद जैसा महसूस हो रहा था, वैसा तो पहले कभी नहीं हुआ था। मेरे मन को ये ख्याल खाए जा रहा था, की क्यों आया है वो फिर मेरी जिंदगी में ? मुझे उसकी अब कोई ज़रूरत नहीं। जब ज़रुरत थी, तब तो छोड़ कर चला गया था। आज जब मै अपनी जिंदगी में खुश हूँ, तो फिर क्यों आया है वो।


               मेरे सामने अगले पल ही ख्याल आया। हमे दूर हुए तो 5 साल हो गए हैं। अब तो उसकी शादी भी हो चुकी होगी और तो और शायद उसका एक बच्चा भी हो। वो तो अपनी जिंदगी में खुश होगा! फिर इस किस्मत ने फिर जिंदगी के उन पन्नो को क्यों पलट दिया जिसकी हमे ज़रुरत नहीं थी ?


               मुझे आज भी याद है। कैसे कॉलेज के आखिरी दिनों में वो मुझ पर शक करने लगा था। उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था की मै किसी और से बात करूं या किसी और के साथ टाइम बिताऊं। उसको ऐसा लगने लगा था की मेरा प्यार कम हो रहा है, और मै अब किसी और को पसंद करने लगी हूँ।


              धीरे धीरे बात बढती गयी। हमारे झगडे होने लगे। शुरुआत में तो वो मुझे मना लेता था,माफ़ी मांग लेता था। लेकिन धीरे धीरे उसे ऐसा लगने लगा, की वही मुझसे प्यार  करता हैं। मै उससे प्यार नहीं करती।


               आखिर हमारे कॉलेज ख़त्म होने वाले थे। मुझे याद है वो सुबह जब मै आखिरी एग्जाम देकर एग्जामिनेशन हाल से बाहर आई थी। वो बाहर ही मेरा इंतज़ार कर रहा था। मुझे देखते ही कहा,"क्या मेरे लिए भी कुछ वक़्त है ?"


             थोड़ी देर बाद हम उसी कॉफ़ी शॉप में थे, जहाँ हमारी पहली मुलाकात हुई थी। हम दोनों खामोश थे। शायद बात करने को कुछ बचा ही नहीं था। थोड़ी देर बाद वो बोला," कितनी अजीब बात है न ? कभी मुझे लगता था की हम एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते। और आज का दिन है की आपको हमारे लिए फुर्सत ही नहीं।"


 
                 मैंने कहा," ऐसा नहीं है।" इसके आगे कुछ कहती उसने कहा," मुझे आपकी बात नहीं सुननी।मैंने अपना फैसला कर लिया है।आज हमारा आखिरी एग्जाम था, और ये हमारी आखिरी मुलाकात है। मै अब और तुम्हारे साथ नहीं रह सकता।" इतना कहकर वो चला गया। लेकिन मुझे  तो जैसे सांप सूंघ गया हो। मुझे तो पता भी नहीं चल रहा था की आस पास क्या हो रहा है।


             "संजना आज ऑफिस नहीं जाना क्या ?" माँ की आवाज से मेरी आँख खुली। मुझे पता ही नहीं चला था की कब मै रात को सो गयी। घडी पर नज़र डाली तो 8 बज रहे थे। जल्दी से तैयार हुई ऑफिस के लिए निकल गयी।


             सच कहूँ तो रास्ते भर दिल को यही ख्याल खाए जा रहा था, की आज फिर उससे मिलूंगी। अगर उसने बात की तो क्या जवाब दूंगी ? और बोलेगा भी तो क्या ? अब तो उसकी फैमिली भी होगी। पूरे रास्ते बस के बाहर आते जाते लोगो को देखती रही। कब ऑफिस पहुंची पता ही नहीं चला।


                  आज ऑफिस पहुँच कर कुछ अजीब सा लग रहा था। ऐसा लग रहा था की मै खुद को किसी से छुपा रही हूँ। वो मेरे सामने वाले केबिन में था। अगर मै बात नहीं भी करना चाहती तो भी वो मुझे बुलाकर बात कर सकता था क्योंकि वो मेरा सीनियर था।


                   उसको आये हुए 1 हफ्ता बीत गया। लेकिन उसने कभी ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे मुझे ऐसा लगे की हम पहले कभी मिल चुके हैं। मुझे तो लगने लगा था की कहीं ऐसा तो नहीं की ये वो ना हो ? लेकिन फिर केबिन पर लिखा नाम उसकी सच्चाई कह देता था।


                    एक दिन अचानक से उसने कहा," कॉफ़ी पीने चले ?" मै तो चाहती थी की उसे मना कर दूँ, लेकिन पता नहीं क्यों उसे मना नहीं कर पायी।


                     अगले दिन हम उसी कॉफ़ी शॉप में थे,जहाँ से हमने अपने जिंदगी की शुरुआत की थी।


                    ख़ामोशी वैसी ही थी, जैसी उस दिन थी जब वो आखिरी बार मिलने आया था। यही तो वो जगह थी जहाँ वो मुझे अकेले छोड़ कर चला गया था। उसने इतना भी मुड़कर नहीं देखा था की मै रो रहीं हूँ या नहीं। मेरा क्या हुआ। उसके बाद उसने पूछा तक नहीं। अरे कम से कम एक फ़ोन तो कर सकता था। ये तो पूछ सकता था की कैसी हो ?


               "ऑफिस से पता चला, की अब तक तुमने शादी नहीं की है।  क्या मेरा इंतज़ार था ?" मैंने ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं की थी। मैंने कहा," मुझे किसी का इंतज़ार नहीं था। बस मै माँ से दूर नहीं होना चाहती। वो अकेली हो जाएँगी इसलिए नहीं की।"


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               मुझे उसकी वो बात याद आ गयी जब उसने कहा था, "माँ हमारे साथ रहेंगी शादी के बाद।"

          उसने कहा,"तो फिर अब शादी कर लें।"


                मेरा पूरा शरीर सुन्न पड गया। उसने कहा," 5 साल से पछता रहा हूँ उस फैसले पर। अब तो माफ़ कर दो। गलती हो गयी है।"
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                   बस यही था कहानी का अंत। एक लम्बे सफ़र के बाद आखिर वो मंजिल मिल गयी थी, जो हम दोनों चाहते थे।

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