Moral stories in hindi for kids :परोपकार का लाभ by Hindi Kahaniya

परोपकार का लाभ

आज की kahani moral stories in hindi से जुडी हुई है जिससे की बहुत अच्छी शिक्षा मिलेगी ये kahani मुख्य रूप से moral story in hindi for kids से जुडी हुई है 

बात उन दिनों की है जब भारत पर राजा चंद्रगुप्त मौर्य का शासन चलता था। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव विजयपुर में एक बहुत ही अच्छा संगीतकार रहता था। वो बहुत गरीब था। उसका छोटा सा कच्चा घर था, जिसे देखकर लगता था कि वो कल ही गिर जाएगा। 

                                               संगीतकार बहुत अच्छा गाना गाता था लेकिन उसे बहुत कम लोग जानते थे। वो एक आँख से काना था। इसलिए उसे कोई गाना गाने के लिए नहीं बुलाता था। लोग उसे घृणा की नज़र से देखते थे।  उसके घर में वो और उसकी पत्नी रहती थीं। क्योंकि उस संगीतकार को कोई गाना गाने के लिए नहीं बुलाता था इसलिए धीरे धीरे उसके घर और ग़रीबी आ गयी। स्थिति ऐसी आ गयी की उसके घर खाने को खाना नहीं रहता था। उसकी पत्नी फल बेचकर कुछ पैसे लाती थी जिससे उसके घर का खर्चा चलता था।
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                                             संगीतकार का संगीत के प्रति काफी प्रेम था, इसलिए इतने कठिन समय मे भी उसने अभ्यास करना नही छोड़ा। उनके दिन जैसे तैसे कट रहे थे। तभी एक साल गाँव में बहुत तेज़ बाढ़ आ गयी। लोगो के घर तबाह होने लगे। संगीतकार भी बहुत डर गया। उसका घर तो वैसे ही लगता था गिर जाएगा। इस बाढ़ में पता नही उसके घर का क्या होगा। एक रात की बात है। बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। तभी उसने अपने घर के बाहर कुछ आवाज़ सुनी। उसने दरवाज़ा खोल कर देखा, तो पाया की उसके दरवाजे पर एक कुतिया खड़ी थी। 
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                                             संगीतकार को जागा देखकर उसकी पत्नी भी जाग गई। उसने दरवाजे पर जाकर देखा तो पाया की वो कुतिया और पिल्ले ठंडी से ठिठुर रहे थे। कुतिया और उसके पिल्ले संगीतकार की तरफ इस तरह देख रहे थे, मानो सहायता मांग रहे हों। संगीतकार की पत्नी ने उन सबको अपने घर में रख लिया। 

                                             संगीतकार ने कहा,"हमारे घर खुद खाने को कुछ नहीं है,तो इसको क्या खिलाएंगे ? वैसे भी इस वक़्त हमारा खुद का कुछ भरोसा नहीं है। इतनी तेज़ बारिश हो रही है पता नहीं कल को हमारा घर रहे न रहे।" पत्नी ने कहा," इसके आ जाने से ऐसा तो नहीं होगा की हमारा घर नष्ट हो जायेगा। शायद इसके भाग्य से ही हम बच जाएँ।" संगीतकार को अपनी पत्नी की बात सही लगी। उसने कुतिया को अपने साथ रखने का फैसला किया। संगीतकार ने उसका नाम सुभागिनी रखा क्योंकि उसके घर आते ही उसके घर में रौनक आ गयी थी।

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                                                   संगीतकार की पत्नी ने उसके और उसके बच्चो के लिए थोड़े चावल बनाये और उनको खाने को दिया। उसने थोडा सा चावल खाया और बाकी का दूसरे दिन के लिए रख लिया। उसने इस तरह खाना खाया की न ही उसका मुह गन्दा हो न ही एक भी दाना नीचे गिरे।

                                                  अगले दिन संगीतकार की पत्नी ने संगीतकार के लिए सूप बनाया और उसे लाकर दिया। सुभागिनी भी वहीँ बैठी थी। उसने जैसे ही संगीतकार का खाना देखा उस तरफ से नज़र हटा ली और दीवार की तरफ देखने लगी। उसने एक बार भी संगीतकार के खाने की तरफ ललचाई नजरो से नहीं देखा। संगीतकार ने कहा," सुभागिनी के लिए भी खाना ले आओ!" उसकी पत्नी ने सुभागिनी को खाना दिया तो उसने थोडा सा खाना खाया और बाकी का अगले दिन के लिए बचा लिया।

वो दिन भर भगवान की मूर्ति के सामने बैठी रहती थी और उसके बच्चे भी उसी के पास बैठे रहते थे। वो संगीतकार को गाना गाते हुए सुनती और उसकी पत्नी को घर का काम करते हुए देखती थी। वो उनकी कोई सहायता नहीं कर पाती थी बस उनको देखकर चुपचाप भगवान की मूर्ति के सामने सिर झुकाए बैठी रहती थी। वो कोशिश करती थी कि वो अपने मालिक का कम से कम खाना खाये। 

                                                उसको ऐसा बैठा देखकर एक दिन संगीतकार की पत्नी ने कहा," देखो कितनी भक्तिन कुतिया है ? दिन भर भगवान को याद करती है और उनकी मूर्ति के सामने ही बैठी रहती है।" इस बात को सुनकर संगीतकार ने हँसते हुए कहा," ऐसा कुछ नहीं है। वो वहां इसलिए बैठी रहती है ताकि कोई चिड़िया नीचे आये तो उसे पकड़कर खा सके।" संगीतकार की पत्नी को ये बात सही नहीं लगी। उसने कहा," आप मानो न मानो लेकिन ये भगवान की बहुत बड़ी भक्तिन है।"
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उसके घर में आने के बाद धीरे धीरे घर की स्थिति बदलने लगी। जब पूरे शहर में बाढ़ आई थी तो उसके पड़ोसियों का घर भी बह गया था लेकिन उसके घर को कुछ नहीं हुआ था। संगीतकार की पत्नी कहती की ये सब सुभागिनी की वहज से हुआ है जो हमारा घर सुरक्षित है। उसका पति उसकी इस बात को नहीं मानता था।

                                            एक दिन सुभागिनी भगवान की मूर्ति के पास बैठी थी। अचानक से एक चिड़िया नीचे आई और सुभागिनी ने उसे पकड़ लिया। उसे पैरो से दबा दिया, फिर उसने एक पैर चिड़िया के ऊपर से हटाया और फिर दूसरा भी हटा दिया और उसे उड़ जाने दिया। संगीतकार ये सब देख रहा था। उस दिन उसे यकीन हो गया की सच में ये कुतिया भगवान की भक्तिन है और साथ ही साथ बहुत ही अच्छे स्वभाव की भी है।

                                                दिन बीतते गए। एक दिन गाँव में ढिंढोरा हुआ की महाराज अपने महल में संगीत का कार्यक्रम करवाना चाहते हैं। इसलिए सभी संगीतकार अपना अपना नाम एक पर्ची पर लिख कर यहाँ जमा कर दें। संगीतकार ने भी ऐसा ही किया। उसने भी अपना नाम पर्ची पर लिख कर जमा कर दिया। 
                                                कुछ दिन बाद एक दिन बड़े सुबह ही राजा का एक सिपाही आया और कहा,"चलो तुम्हे महाराज ने बुलाया है गाना गाने के लिए। सभी संगीतकारों के नाम एक कमरे में रखे गए थे। जब अगले दिन दरवाजा खोला गया तो सिर्फ तुम्हारे नाम की पर्ची बची थी बाकी सब पर्ची उड़ गयी थी।"  ये बात सुनकर संगीतकार की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। थोड़ी देर में ही उसके घर में वो उसकी पत्नी सुभागिनी और उसके बच्चे नाच रहे थे और खेल रहे थे। 
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                                                 संगीतकार का गाना राजा को बहुत पसंद आया और उन्होंने उसे अपना सबसे प्रिय संगीतकार बना लिया। धीरे धीरे उस संगीतकार की प्रसिद्धि बढ़ती गयी। साथ ही साथ वो और अमीर होता चला गया। अब वो इतना प्रसिद्ध हो गया कि उसे सुनने लोग दूर दूर से आने लगे। राजा ने उसे अपने महल में ही रहने का स्थान दे दिया। संगीतकार अब महल में ही रहने लगा, अपने पूरे परिवार के साथ अपनी पत्नी और सुभागिनी और उसके बच्चो के साथ।


शिक्षा- कभी कभी हमे पता ही नहीं चलता की हमारे साथ जो अच्छा हो रहा है वो किस पुण्य की वजह से हो रहा है। इसलिए हमे हमेशा दूसरो की सहायता करनी चाहिए। बिना ये सोचे की उससे हमे क्या फायदा होगा ? क्योंकि क्या पता किसकी सहायता का पुण्य कब आपके अच्छे दिन ले आये।


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