Moral stories in hindi for kids : आपदधर्म by no1hindikahaniya

आपदधर्म 


नमस्कार दोस्तो आज आप पढ़ेंगे moral story आपद्धर्म ये kahani मुख्य रूप से moral story for kids है जो एक hindi moral story है।

बहुत पुरानी बात है। एक बार कुरुदेश में बहुत ज्यादा बारिश और बर्फ़बारी की वजह से सभी अनाज ख़राब हो गयें। लोगो के पास खाने को थोडा भी अनाज नहीं बचा। स्थिति ऐसी आ गयी की लोग भूखे मरने लगे। पूरी तरह अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गयी। उसी देश में एक ऐसा गाँव था जहाँ सभी लोग हाथी रखते थे और सभी लोग महावत (हाथी को चलाने वाला ) थे। उस गाँव में महावतो के सिवा कोई नहीं रहता था। इसलिए उस गाँव का नाम इभ्य था।
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उसी गाँव के बाहर चक्रमुनि के पुत्र उषस्ति अपनी पत्नी आटिकी के साथ रहते थे। अकाल की वजह से उनके पास भी कुछ खाने को नहीं था। पूरे देश में हाहाकार मचा हुआ था। लोग भूख से व्याकुल हो रहे थे और अन्न की खोज में इधर उधर भटक रहे थे। ऋषि उषस्ति के पास भी जब खाने को कुछ नहीं बचा तो वो भी खाने की तलाश में अपनी पत्नी आटिकी के साथ निकल दिए।


क्योंकि पूरे देश में अकाल था, इसलिए काफी भटकने के बाद भी उन्हें कहीं भी कुछ भी खाने को नहीं मिला। स्थिति यहाँ तक आ गयी की ऋषि की पत्नी आटिकी को चक्कर आने लगा और वो बेहोश हो गयीं। मुनि उषस्ति ने उन्हें एक पेड़ के नीचे लिटाया और उनके चेहरे पर पानी के छीटे मारें और उनको पानी पिलाया। जब उनको होश आया तो मुनि ने कहा," मै कहीं से कुछ खाने के लिए लेने जा रहा हूँ। कुछ मिलते ही मै वापस आ जाऊंगा। तब तक तुम यहाँ आराम करो।" इतना कहकर वो खाने की तलाश में चले गए। चलते चलते वो इभ्य गाँव में पहुंचे। जहाँ सिर्फ महावत लोग रहते थे।

 
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गाँव में पहुँचने पर उन्होंने वहां देखा की एक महावत उड़द खा रहा था। मुनि उषस्ति ने उससे कहा," मै बहुत भूखा हूँ और मेरी पत्नी की स्थिति भी बहुत ख़राब है। काफी दिन हो गये अन्न का एक दाना तक पेट में नही गया है। तुम कृपा करके थोड़े उड़द मुझे भी खाने को दे दो, जिससे की मेरी जान बच जाए और मेरी पत्नी भी स्वस्थ हो जाए।"

 

महावत ने सोचा की ये मुनि काफी परेशान हैं। इनकी सहायता करना मेरा धर्म बनता है। लेकिन वो भी क्या करता उसके पास भी उतने ही उड़द थे और वो भी जूठे। महावत ने कहा," ऋषिवर! मेरे पास इतने ही उड़द हैं और वो भी जूठे हैं। जूठे उड़द मै आपको कैसे दे सकता हूँ ?"


इस पर ऋषि उषस्ति ने कहा," तुम मुझे जूठे उड़द ही दे दो। जब जान पर दिक्कत आ जाए तो जूठा सच्चा नहीं देखा जाता। इसी को आपद्धर्म कहते हैं।"


जब महावत ने ऋषि की बात सुनी तो उन्हें खाने के लिए उड़द दे दिया। ऋषि उषस्ति ने थोड़े उड़द खाए और बाकी का अपनी पत्नी आटिकी के लिए रख लिया। उड़द खाने के बाद वो जाने लगे।


जब वो जाने लगे तो महावत ने कहा की ऋषिवर पानी तो पी लीजिए। खाने के बाद थोडा पानी पी लेना चाहिए। इससे थोडा आराम मिलेगा।


ऋषि उषस्ति ने गुस्सा होते हुए कहा," पानी तो तुम्हारा जूठा है। मै उसे कैसे पी सकता हूँ ?"


महावत ने कहा उड़द भी तो मेरा जूठा था। आपने उसे कैसे खा लिया ? तो उषस्ति बोले," वो तो आपद्धर्म था। यानी आपदा के वक़्त मैने अपने प्राण बचाने के लिए तुम्हारी उड़द खायी। लेकिन अब आपदा नहीं है। मै पानी तो कहीं भी पी सकता हूँ। और अगर इस स्थिति में मै तुम्हारा जूठा पानी पीता हूँ तो मेरे धर्म का नाश होगा।" इतना कहकर मुनि उषस्ति वहां से चल दिए।


वहां से चलकर वो अपनी पत्नी आटिकी के पास पहुंचे। और उन्हें उड़द की पोटली दी उड़द खाने के लिए। आटिकी को पहले ही किसी दयालु इंसान ने दान में भरपेट भोजन करा दिया था। इसलिए आटिकी ने कहा की मैंने पहले ही भोजन कर लिया है इसको रख दीजिये सुबह के लिए। रात ज्यादा हो गयी थी इसलिए दोनों लोग सो गए।


अगले दिन मुनि उषस्ति उठे और नित्य क्रिया से संपन्न होने के बाद आटिकी से बोले की अगर कुछ खाने को मिल जाता तो मै उसे खाकर कुछ धन कमाने के लिये चला जाता। सुना है पडोसी राजा एक बहुत बड़ा यज्ञ करा रहे हैं तो अगर मै वहां चला जाऊंगा तो वो मुझे यज्ञ करने वाले के लिए चुन लेंगे। जिससे कुछ धन मिलेगा और हमारा गुजारा हो जायेगा। 


आटिकी ने बताया की जो उड़द उन्होंने कल दिया था वो बचा हुआ है। वो चाहे तो उसे खा सकते हैं। उषस्ति ने उस उड़द को खाया और यज्ञ कराने चल दिए।


जब तक मुनि उषस्ति पहुँचते वहां यज्ञ की सारी तैयारियां हो चुकी थीं। जो लोग यज्ञ कराने वाले थे वो अपनी अपनी जगह ले चुके थे। मुनि उषस्ति भी उन्ही लोगो के पास जाकर बैठ गए।

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जब यज्ञ शुरू हुआ तो पहले भगवान की प्रार्थना शुरू हुई। जब प्रार्थना शुरू हुई तो उषस्ति ने टोकते हुए पूछा," क्या आपको पता है की इनके इष्टदेव कौन हैं ? क्या आप उनके बारे में पूरी तरह जानते हैं ? क्योंकि अगर आप उनके बारे में पूरी तरह नहीं जानते तो यज्ञ का बुरा प्रभाव पड़ेगा।"


कोई भी इसका सही जवाब देने में सक्षम नहीं था। सभी ऋषि लोगो की ये स्थिति देखकर राजा ने कहा," मुनिवर! मुझे अपना परिचय देने की कृपा करें।"


मुनि उषस्ति ने अपना परिचय दिया तो राजा ने कहा," महाराज मै आपको ही खोज रहा था। लेकिन बहुत खोजने के बाद भी आप नहीं मिले तो मुझे यज्ञ के लिए इन्हें चुनना पड़ा। कृपा करके आप इस यज्ञ को पूर्ण करायें।"


उषस्ति ने कहा,"महाराज! यज्ञ तो यही लोग कराएँगे लेकिन मै इनको रास्ता दिखा सकता हूँ। इसके लिए आपको मुझे दक्षिणा देनी होगी। उतनी ही जितनी आप इन लोगो को देंगे।"


राजा ने इस बात को स्वीकार कर लिया। 


यज्ञ शुरू हो गया। उषस्ति ने बताया की इनके इष्टदेव प्राण देव हैं। इसलिए आप लोग उनकी स्तुति करें। 


इस प्रकार यज्ञ को पूर्ण करा कर उषस्ति दक्षिणा लेकर अपने घर लौट आये।


शिक्षा
-   इस कहानी से हमे दो शिक्षा मिलती है। पहली ये की अगर जान संकट में हो तो नियम का कोई महत्व नहीं होता। उस वक़्त वही करना चाहिए जिससे आपकी जान बच जाए। दूसरी शिक्षा ये मिलती है की अधूरे ज्ञान के साथ कोई भी काम नहीं करना चाहिए वरना आपकी हानि ही होगी।


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