MORAL STORIES IN HINDI FOR STUDENTS : आखिरी कहानी आपका जीवन बदल सकती है।

Moral Stories In Hindi For Students छोटे से लेकर बड़े कक्षा में पढ़ने वाले सभी बच्चो के लिए इन कहानियों को पढ़कर वो अपना ज्ञान बढ़ा सकते।

छोटे बच्चो को moral stories बहुत पसंद आती हैं। आपने लोगो को ये कहते भी सुना होगा कि बच्चो का आधार moral stories पर ही निर्भर करता है।

 इसका सीधा सा कारण है कि बच्चे जो भी सीखते है वो कहानियों से आसानी से सीखते हैं। साथ ही साथ उन्हें कहानियां पसंद भी आती हैं। इसलिए आज हम इस पोस्ट कुछ ऐसी Moral Stories In Hindi For Students को पढ़ेंगे जिनको पढ़ने में मज़ा भी आये।


LIST OF MORAL STORIES IN HINDI FOR STUDENTS


Story No. 1 of Moral Stories In Hindi For Students 

आत्मा क्या है? 


ये कहानी छान्दोग्योपनिषद से ली गयी है और Moral Stories In Hindi For Students के रूप में संग्रहित की गई है।


एक बार की बात है। देवो के देव ब्रम्हाजी ने एक बहुत ही भव्य सत्संग का आयोजन किया। उसमे उन्होंने बड़े-बड़े ऋषि, मुनियों, मानव दानव, देवता सभी लोगो को बुलाया। सभी लोग उपस्थित हुए। 

          सत्संग शुरू हो गया। बहुत सी दुनिया की बातें बताई गयीं। बताया गया की लोगो को कैसा आचरण करना चाहिए और सभी लोग के साथ कैसा व्यवहार रखना चाहिए। अंत में जब सत्संग ख़त्म होने वाला था तो ब्रम्हा जी ने आत्मा के बारे में बताना शुरू किया। 

            उन्होंने आत्मा के बारे में बताया की वो कभी मर नहीं सकती और न ही वो कभी बूढी हो सकती है। वो हमेशा से थी और आने वाले समय में हमेशा रहेगी भी। आत्मा को किसी तरह का शोक नहीं होता। वो कोई पाप नहीं करता। उसे कोई बिमारी नहीं होती। वो सिर्फ वही जानता है जो सत्य है। और वही करता है जो सत्यकार्य होता है। 

यानी की वो सिर्फ अच्छे कार्य करता है। आत्मा को कभी भी भूख प्यास नहीं लगती है। हमे इस आत्मा के बारे में अच्छी तरह जानना चाहिए। जो भी आत्मा के बारे में अच्छी तरह जान लेता है या उसे महसूस कर लेता है। उसे वो सब मिल जाता है जो वो चाहता है। और तो और वो सारे संसार को आसानी से जीत सकता है। 

इसी बात के साथ ही ब्रम्हाजी ने सत्संग को ख़त्म किया। और लोगो को अपने अपने घर जाने को कहा।

 जब सभी लोग घर पहुंचे, तो दानवो और देवताओं ने अपने-अपने पक्ष के साथ आत्मा के बारे में बात किया। दोनों ही पक्षों को लगा की हमे आत्मा के बारे में और जानना चाहिए। लेकिन हम आत्मा के बारे में कैसे जानेंगे? ये सवाल सभी के मन में था।

 तो ऐसा निर्णय हुआ की हमे आत्मा के बारे में ब्रम्हाजी ने बताया है। यानी की वो आत्मा के बारे में जानते होंगे। इसलिए हमे उनके पास ही चलना चाहिए। वही हमे आत्मा के बारे में अच्छे से ज्ञान दे सकते हैं। 

जब ये निर्णय हो गया। तो दानवों ने विरोचन को और देवताओं ने इंद्र को अपना नेता बनाकर ब्रम्हाजी के पास आत्मा के बारे में जानने के लिये भेजा। दानव और देवता आपसी दुश्मनी भुला कर एक साथ होकर ब्रम्हाजी के पास गए और उन्हें लेटकर प्रणाम किया। प्रणाम करने के बाद दोनों ही हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

दोनों लोगो को एक साथ देखकर ब्रम्हाजी अचम्भा हो गए। उन्होंने पूछा तुम दोनों तो एक दूसरे के बहुत बड़े दुश्मन हो। फिर आज एक साथ कैसे? ऐसा क्या कारण है की तुम दोनों एक साथ हो गए और मेरे पास आये हो।

तब दोनों एक साथ बोले , "भगवन! हम आपके सत्संग में आये थे और हमने पूरा सत्संग अच्छे से सुना। हमने अपनी सभा में इस विषय में चर्चा भी की। आपने सत्संग में आत्मा के विषय में बताया था। हम उस आत्मा के बारे में और ज्यादा जानना चाहते हैं। कृपा करके आप हमे आत्मा के बारे में और ज्यादा बताएं।"

ब्रम्हाजी ने कहा,"ठीक है। मै आपको आत्मा के बारे में बताऊंगा। लेकिन उसके पहले तुम दोनों 32 साल के लिए तन मन से तपस्या करो। जब तुम दोनों तपस्या करके लौटोगे तो मै आत्मा के बारे में बताऊंगा।"

ब्रम्हाजी की आज्ञा से इंद्र और विरोचन तपस्या करने चले गए।

32 साल की तपस्या जब पूरी हो गयी तो विरोचन और इंद्र वापस ब्रम्हाजी के पास आये और बोले। "भगवान! हमने वही किया जैसा आपने कहा था। अब कृपा करके हमे आत्मा के बारे में बताएं।

ब्रम्हाजी उनसे बड़े खुश हुए और उन्हें आत्मा के बारे में बताना शुरू किया।

 ब्रम्हाजी ने कहा ,"आत्मा के बारे में ज्ञान दिव्य आँखों से हो सकता है। जो आत्मा दिव्य आँखों से दिखाई देती है वो सबमे है। वही आत्मा है और वही अजर अमर और कभी न मरने वाली है। वही सत्य है। बाकी सब झूठ है।"

दोनों लोगो ने ब्रम्हा जी की बात सुनी। लेकिन उन्हें कोई भी बात समझ नहीं आई। उन्हें कुछ भी समझ न आने का कारण था की उनके मन अभी भी मैले थे। यानी की पाप से भरे थे। 

उन दोनो लोगो को बस इतना ही समझ में आया की आँखों से देखने पर जो प्रतिबिम्ब दिखाई देता है वही आत्मा है।

 उन लोगो ने ब्रम्हाजी से पूछा ,"प्रभो! जल में और शीशे में जो प्रतिबिम्ब दिखाई देता है उनमे से आत्मा कौनसी है? क्या दोनों ही आत्मा है? या कोई एक है? कृपा कर इतना हमे बताएं।"

ब्रम्हाजी ने कहा ,"हाँ हाँ वही आत्मा है। दिव्य नेत्रों से जो आत्मा दिखाई देती है वो हर जगह है। उसकी परछाई हर जगह दिखाई देती है।"

ब्रम्हाजी जान गए थे की इन दोनों को लोगो को कुछ भी समझ नहीं आया है। इसलिए उन्होंने एक तरकीब सोची। 

वो दोनों कोे एक झील के पास ले गए। उन्होंने कहा इस झील में अपनी आत्मा को देखो। यही आत्मा है।

दोनों ने झील में झाँका। ब्रम्हाजी ने पूछा बताओ तुमको क्या दिखाई दे रहा है? दोनो लोग एक साथ बोले ,"भगवान! हम सिर से लेकर पैर तक अपनी आत्मा को देख रहे हैं।"

ब्रम्हाजी ने कहा ,"ठीक है। अब तुम दोनो एक काम करो। जाओ और अच्छे से तैयार होकर आओ।"

थोड़ी देर बाद वो दोनों अच्छे अच्छे कपडे पहने ब्रम्हाजी के सामने खड़े थे।

ब्रम्हाजी ने कहा ,"अब फिर अपनी आत्मा को झील में देखो और बताओ की क्या देख रहे हो?"

दोनों ने झील में देखते हुए कहा ,"भगवान! हमारी आत्मा ने भी बिलकुल वैसे ही कपडे पहने हैं जैसे की हमने। वो भी काफी खूबसूरत लग रहा है जैसे की हम।"

ब्रम्हाजी ने कहा यही तो आत्मा है। जो की कभी नहीं मरती। और हमेशा के लिए अमर है। और इसे कोई रोग नहीं हो सकता।

ब्रम्हाजी की बात को सुनकर वो दोनो वहां से चले गए। यानी की वो उस बात को नहीं समझ पाए जो बात ब्रम्हाजी कहना चाह रहे थे। और वो परछाई को ही आत्मा समझ कर वहां से चले गए।

ब्रम्हाजी इस बात से बड़े परेशान हो गए की ये दोनों लोग असली आत्मा के बारे में जाने बिना जा रहे हैं। और ये गलत ज्ञान के साथ जा रहे हैं। और अगर वो गलत ज्ञान के साथ जायेंगे तो उनको घाटा ही होगा। जो की अच्छी बात नहीं है।

दानवो का नेता विरोचन शरीर को ही आत्मा समझ बैठा और बहुत खुश हुआ।

 वो दानवो के पास गया और उन्हें बताया की यह शरीर ही आत्मा है। ये बहुत महान है। हमे इसकी पूजा करनी चाहिए। और यही है जो सभी लोको में सुख पाता है। इसलिए इस शरीर का जितना हो सके ख्याल रखो। इसे जितना हो सके सजाओ और जितना हो सके खाना खिलाओ और इसे खुश रखो। 

बस फिर क्या था। दानव शरीर का अच्छे से ख्याल रखने लगे। शरीर को सुख देने के चक्कर में ऐसे कार्य करने लगे जो की बहुत बुरे थे। वो मदिरा का सेवन करने लगे।

इधर इंद्र को इस ज्ञान से ज्यादा संतुष्टि नहीं हुई। वो सोचने लगे की ब्रम्हाजी ने आत्मा के बारे में बताया था की उसको कोई रोग नहीं हो सकता है। वो कोई पाप नहीं कर सकता है। और तो और वो न ही जन्म लेता है और न ही मरता है। 

अगर मै परछाई को ही आत्मा मान लूँ तो वो तो तब ख़त्म हो जाएगा जब मै मर जाऊँगा। अगर मै बीमार होता हूँ तो वो भी बीमार हो जाएगा। मतलब की ब्रम्हाजी ने हमे गलत बताया है। वो आत्मा नहीं हो सकती।

इंद्र रास्ते से ही वापस ब्रम्हाजी के पास लौट आये। 





इंद्र को दुबारा देखकर ब्रम्हाजी ने कहा तुम और विरोचन तो ख़ुशी ख़ुशी चले गए थे। फिर तुम वापस क्यों आये हो?

इंद्र ने कहा भगवान मुझे लगता है। जो आपने बताया है वो सही ज्ञान नहीं है। आपने हमे आत्मा के बारे में सही ज्ञान नहीं दिया है। आपने हमे गलत बताया है। 

ये शरीर की परछाई आत्मा कैसे हो सकती है? क्योंकि अगर शरीर ख़त्म हो जाए तो परछाई भी ख़त्म हो जायेगी। मतलब आत्मा भी ख़त्म हो जायेगी। जबकि आपने कहा था की आत्मा कभी ख़त्म नहीं हो सकती। यानी की ये शरीर की परछाई आत्मा नहीं है। कृपा करके मुझे सही ज्ञान दें और आत्मा का सही ज्ञान कराएं।

ब्रम्हाजी मुस्कुराये और बोले इंद्र तुम सही कहते हो। ये आत्मा नहीं है। अगर तुम सच में चाहते हो की मै तुम्हे आत्मा के बारे में सही ज्ञान दूँ। तो तुम फिर से 32 साल के लिए तपस्या करने जाओ। जब तुम तपस्या करके वापस आओगे तो मै तुम्हे आत्मा का सही ज्ञान दूंगा। 

इंद्र ब्रम्हाजी की आज्ञा मानकर फिरसे तपस्या करने चले गए। और 32 साल तक तपस्या करते रहे। जब 32 साल पूरे हो गए तो वो वापस ब्रम्हाजी के पास आये। और कहा भगवान! मैंने आपके कहे अनुसार 32 साल और तपस्या की है। अब आप कृपा कर मुझे आत्मा के बारे में सत्य बातें बताएं।

ब्रम्हाजी ने बड़े ही शांत शब्दों में कहा। सपने में हम खुद को जिस रूप में देखते हैं वही आत्मा है। सपने में दिखाई देने वाला रूप ही अमर है। उसको कोई बिमारी नहीं हो सकती। वह किसी से नहीं डरती।

ब्रम्हाजी की ये बात सुनकर इंद्र को लगा की ये आत्मा के बारे में सही ज्ञान है। और वो चल दिए। रास्ते में चलते-चलते वो सोचने लगे की क्या ब्रम्हाजी ने सही ज्ञान दिया या गलत। 

वो सोचने लगे की पानी में दिखाई देने वाली परछाई और स्वप्न में दिखाई देने वाले शरीर में कुछ तो फर्क होगा? 

तभी तो वो आत्मा है। वो सोचने लगे की हम तो सपने में भी कभी कभी खुद को बीमार देखते हैं। लेकिन ब्रम्हाजी ने कहा था की आत्मा को कोई भी बीमारी नहीं हो सकती।

 और तो और सपने में कभी कभी हमारा शरीर डर जाता है। और उन्होंने कहा था की आत्मा किसी से डरती नहीं है। कभी कभी हम सपना देखते हैं की कोई हमे पीट रहा है और हम डर कर भाग जाते हैं। सपने बुरे भी होते हैं। यानी की सपने में जो हम शरीर देखते हैं वो आत्मा नहीं है। ब्रम्हाजी ने मुझे गलत बताया है। 

इतना ख्याल मन में आते ही इंद्र वापस ब्रम्हाजी के पास चल दिए।

फिरसे इंद्र को अपने सामने देखकर ब्रम्हाजी ने कहा। अब क्या बाकी रह गया? मैंने तो तुम्हे आत्मा के बारे में सब बता दिया है।

इंद्र ने कहा भगवान! आपने आत्मा के बारे में जैसा बताया है सपने की आत्मा वैसी नहीं होती है। इसलिए मुझे सही आत्मा का ज्ञान कराने की कृपा करें। 

ब्रम्हाजी ने कहा। अगर आत्मा के बारे में सही ज्ञान चाहते हो तो फिरसे 32 साल की तपस्या करो और वापस मेरे पास आओ। जैसे गुरु के पास एक शिष्य आता है। तब मै तुम्हे आत्मा का ज्ञान कराऊंगा।

32 साल की तपस्या करके इंद्र वापस ब्रम्हाजी के पास गए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। 

ब्रम्हाजी ने इंद्र को उपदेश देना शुरू किया। सोने के समय जब सारी इन्द्रियाँ शांत हो जाती हैं। जब वो कोई भी सपना नहीं देखता है। उस समय निश्चिंत होकर सोता हुआ भी जो अपने रूप को नहीं बदलता वही आत्मा है। यह आत्मा किसी से नहीं डरती।

इस बात को सुनकर इंद्र को लगा की ये सही ज्ञान है और वो अपने घर को चल दिए। इस बार भी रास्ते में जाते वक़्त उनके मन में संदेह उत्पन्न हो गया। वो वापस ब्रम्हाजी के पास आये। 

वो ब्रम्हाजी से बोले। मैंने रास्ते में विचार किया की सोने के समय तो जीव को कुछ भी पता नहीं रहता, तो फिर वो यह कैसे जानेगा की यह मै हूँ। वह ऐसा विचार कैसे कर सकता है। उस समय वह मरे हुए की तरह होता है। फिर उसे आनंद कैसे मिलेगा। इसलिए आत्मा के बारे में मुझे ये बात भी गलत लगती है।

ब्रम्हाजी ने कहा। इंद्र तुम ठीक कहते हो। सोने के समय आत्मा को अपने अवस्था के बारे में नहीं पता होता है। इस बार तुम सिर्फ 5 साल के लिये तपस्या करके आओ। इस बार मै तुम्हे असली आत्मा के बारे में बताऊंगा।

इस तरह से इंद्र ने कुल 101 साल तक तपस्या की और ब्रम्हाजी की बात का पालन किया। जब इंद्र वापस आये तो ब्रम्हाजी ने उन्हें आत्मा के बारे में सही ज्ञान देते हुए कहा। 

इंद्र ये शरीर जो तुम देख रहे हो, ये किसी न किसी दिन ख़त्म हो जाएगा लेकिन आत्मा कभी भी ख़त्म नही होती। आत्मा इस शरीर से अलग है। 

आत्मा को कोई भी दुःख नहीं होता। उसे सिर्फ आनंद होता है। आत्मा इस शरीर से जब तक जुडी रहती है तब तक ही हमे सुख दुःख का पता चलता है। जब कोई आत्मा के बारे में अच्छे से जान लेता है तो उसे अपने शरीर पर घमंड नहीं रह जाता और उसे आनंद मिलता है। 

ब्रम्हाजी बोले ये आत्मा ही जब तक शरीर में रहती है तब ही तक कोई बोलता है चलता है सुनता है देखता है और सोचता है। यदि शरीर से आत्मा निकल जाए तो कोई भी इंद्री काम नहीं करती है।

आत्मा के बिना शरीर का कोई भी मोल नहीं है। जो इस आत्मा को जान लेता है और उसकी आराधना करता है। वही सब जगह सुख पाता है।

इस बार इंद्र को आत्मा के बारे में सही ज्ञान मिल गया और वो ख़ुशी ख़ुशी अपने घर चले गए।

शिक्षा- जल्दबाजी में हमे कोई भी काम नहीं करना चाहिए। हमे तब तक किसी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए, जब तक उस का प्रमाण न मिल जाए। हमे पूरा ज्ञान लेना चाहिए। क्योंकि अधूरा ज्ञान मीठे जहर के समान होता है।


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Story No. 2 Of Moral Stories In Hindi For Students

असली ब्रम्हज्ञान 


ये कहानी छान्दोग्योपनिषद से ली गयी है और Moral Stories In Hindi For Students के रूप में संग्रहित की गई है।


बहुत पुराने ज़माने की बात है। जैसे आज के ज़माने में शिक्षा के लिए बड़े बड़े विश्वविद्यालय हैं। उसी तरह से पुराने ज़माने में गुरुकुल हुआ करते थे। और उस गुरुकुल के प्रधानाचार्य को कुलपति कहा जाता था। ऐसे भारत देश में कई बड़े बड़े गुरुकुल थे। जहाँ दूर दूर से बच्चे पढने आते थे।

एक बार की बात है। पांच गुरुकुलो के कुलपतियों ने मिलन समारोह रखा। इनमे थे उपमन्यु पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषपुत्र सत्ययज्ञ, भल्लवपुत्र इन्द्रदुम्र, शर्करापुत्र जन और अश्वतराशिव पुत्र बुडिल। ये पांचो लोग काफी ज्यादा ज्ञानी थे। और साथ ही साथ वेद का अच्छा ज्ञान रखने वाले थे।

उस मिलन में सभी लोगो के बीच में यह बात शुरू हो गयी की आत्मा क्या है? और ब्रम्हा क्या हैं? लोगो में काफी बात हुई। लेकिन इस बात का कोई अंत न हो पाया, न ही कोई इसके जवाब से संतुष्ट हो पाया। 

आखिरकार उन्होंने सोचा की हमे किसी ऐसे इंसान के पास चलना होगा जिसे ब्रम्हा के बारे में बहुत अच्छे से ज्ञान प्राप्त हो। 





पांचो लोगो ने बात किया और पहुँच गए मुनि उद्दालक के आश्रम में। वे लोग सोचते थे की उद्दालक मुनि ब्रम्हज्ञानी हैं। लेकिन जब वो उनके पास पहुंचे तो उन्हें पता चला की मुनि उद्दालक खुद ब्रम्हज्ञानी की तलाश में हैं।

मुनि उद्दालक ने उन लोगो को रास्ता बताते हुए कहा। आप लोग जिस कार्य के लिए मेरे पास आये हैं मैं वो कार्य पूरा तो नहीं कर सकता। लेकिन इतना ज़रूर बता सकता हूँ की आपके कार्य को कौन पूरा कर सकता है।

उन्होंने बताया की कैकय के पुत्र अश्वपति जो इस वक़्त कैकय देश के राजा भी हैं। वो आपको इस बात का ज्ञान करा सकते हैं।

इस बात के बाद छहों लोग राजा अश्वपति से मिलने के लिए निकल दिए। जब वो राजा के दरबार में पहुंचे तो राजा ने उन लोगो का काफी अच्छे से स्वागत किया और उन्हें रहने का महल में स्थान भी दिया। अगले दिन सुबह ही राजा अश्वपति ढेर सारे धन के साथ उन लोगो के पास पहुचे और उन्हें वो धन ग्रहण करने को कहा। 

उन लोगो ने उस धन को लेने से इनकार कर दिया और कहा की हम यहाँ पर ब्रम्हज्ञान प्राप्त करने आये हैं। इस बात को सुनकर राजा सोच में पड़ गए क्योंकि वो सभी लोग ज्ञानी थे फिर भी उन्होंने वैदिक विधि द्वारा ज्ञान को नहीं माँगा था। राजा ने बात को टालते हुए कहा की ठीक है मैं उस ज्ञान के बारे में आपको कल बताऊंगा।

राजा के जाने के बाद सभी लोग सोच में पड़ गए की राजा ने आखिर उन्हें ज्ञान देने से मना क्यों कर दिया। काफी देर सोचने के बाद उन्हें समझ में आया की उन्होंने वैदिक विधि द्वारा ज्ञान नहीं माँगा। इसलिए राजा ने ज्ञान देने से मना कर दिया। 

अगले दिन सुबह ही छहों लोग तैयार होकर हाथ में फूल लिए राजा के सामने उपस्थित हुए और वैदिक विधि द्वारा ज्ञान की मांग की।

राजा अश्वपति इस बात से बहुत खुश हुए और उन्हें ब्रम्हज्ञान दिया।

शिक्षा - सिर्फ पुस्तक का ज्ञान होने से कोई ज्ञानी या विद्द्वान नहीं बन जाता। उसके लिए क्रियात्मक बोध होना भी ज़रूरी है। तभी असली ज्ञान का लाभ होगा।


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Story No. 3 Of Moral Stories In Hindi For Students

देवताओं का गर्व हरण


ये कहानी छान्दोग्योपनिषद से ली गयी है और Moral Stories In Hindi For Students के रूप में संग्रहित की गई है।


आपने अपने जीवन में देवताओं और राक्षसों का नाम तो सुना ही होगा। हमने हर कहानी में सुना होगा की राक्षस जहाँ भयानक विनाशकारी और दुष्ट होते हैं, वहीँ देवता दयालु सभी पर कृपा करने वाले और लोगो की रक्षा करने वाले होते हैं। तो आज हम देवताओं और राक्षसों से जुडी एक ऐसी ही कहानी पढेंगे।

देवता और राक्षस के पिता एक ही हैं। यानी की दोनों एक दूसरे के भाई हैं। बस दोनों लोगो की माताजी अलग अलग हैं। दोनों लोग पूरे संसार पर अपना राज्य स्थापित करना चाहते हैं। 

अपना राज्य स्थापित करने के लिए ये दोनों ही हमेशा आपस में लड़ते रहते हैं। कभी राक्षसों की जीत होती तो कभी देवताओं की। देवताओं की माता का नाम अदिति और राक्षसों की माता का नाम दिति है।

एक बार की बात है। राक्षसों ने देवताओं पर हमला कर दिया। बहुत ही भयानक युद्ध हुआ। 

काफी लोग मारे गए। राक्षस लोग बहुत ज्यादा ताक़त वाले थे इसलिए वो जीत रहे थे और देवता लोगो की हार हो रही थी। स्थिति यहाँ तक आ गयी की देवताओं के जान बचने की भी आशा न रही। राक्षसों ने देवताओं को बहुत मारा और जान से मार देने का भी प्रयास किया।

 देवता लोग किसी तरह बच कर जंगल में जाकर छुप गए और अपनी जान बचायी। अंत में जब उन्हें कोई रास्ता नहीं दिखायी दिया तो उन्होंने ब्रम्हाजी की प्रार्थना करना शुरू कर दिया। जिससे उन्हें ताक़त मिली और वो राक्षसों को हरा सकें।

ब्रम्हाजी को देवताओं के इस हाल को देखकर तरस आ गयी। ब्रम्हाजी ने देवताओं को शक्ति दे दी। शक्ति पाकर देवता लोग बहुत शक्तिशाली हो गए और उन्होंने राक्षसों पर दुबारा धावा बोल दिया, जिसमे देवताओं की जीत हुई। 

वो सब अपनी विजय से इतने खुश हुए की वो ख़ुशी धीरे धीरे घमंड का रूप लेने लगी। और इस घमंड के चक्कर में वो ये भूल गए की ये जो ताक़त उन्हें मिली है उसकी वजह ब्रम्हाजी हैं। अगर वो न होते तो हम लोग कुछ भी नहीं कर पाते।

इधर स्वर्ग में जीत की ख़ुशी में समारोह हो रहा था। और उधर ब्रम्हाजी विचार कर रहे थे। ब्रम्हाजी ने सोचा की देवताओं को अपनी जीत पर घमंड हो गया है। उनको घमंड नहीं करना चाहिए। क्योंकि घमंड करने पर विनाश हो जाता है। उन्होंने निश्चय किया की वो देवताओं के घमंड को ख़त्म कर देंगे। 

देवताओं के घमंड को तोड़ने के उद्देश्य से ब्रम्हाजी ने यक्ष का रूप लिया और पहुँच गए स्वर्ग में। वहां सभी लोग जीत का जश्न मन रहे थे।

समारोह चल रहा था। तभी देवताओं ने सभा में एक बहुत ही सुन्दर और बड़े यक्ष को देखा तो वो सब अचम्भित हो गए। यक्ष बहुत ही बलवान लग रहा था। उसे देखकर सभी देवता और खुद इंद्र डर गए।

 वो सब लोग इतना डर गए थे की किसी में इतना साहस नहीं था की जाकर उस यक्ष से उसका नाम और परिचय पूछ सके। सभी देवता एक दूसरे का मुह देखने लगे की आखिर कौन उसका परिचय पूछेगा?




काफी देर विचार के बाद सभी लोगो ने सोचा की हम सभी लोगो में सबसे बुद्धिमान अग्निदेव हैं। इसलिए वहीँ यक्ष का परिचय पूछने जाएँ। इंद्र ने अग्निदेव को यक्ष का परिचय लेने के लिए भेजा की जाओ और पता करके आओ की ये यक्ष कौन है और वो स्वर्ग में किसलिए आया है। 

अग्निदेव जब यक्ष का परिचय पूछने गए तो उल्टा यक्ष ने उन्ही से पूछा की तुम कौन हो?  इस पर अग्निदेव गुस्सा हो गए और कहा तुम ये भी नहीं जानते की मैं कौन हूँ? मैं अग्निदेव हूँ। इस पर यक्ष ने पूछा तुम क्या कर सकते हो? मतलब तुममें कितनी ताक़त है।

अग्निदेव को वैसे ही बहुत घमंड था। इसलिए वो मन ही मन सोचने लगे की ये कितना बडा पागल है। इसे ये तक नहीं पता की मैं क्या कर सकता हूँ। अग्निदेव उससे बोले की इस दुनिया में तुम्हे जो भी दिखायी दे रहा है उसे मैं पलक झपकते ही जला कर राख कर सकता हूँ।

यक्ष मन ही मन बहुत हंसा। फिर अग्निदेव की तरफ एक तिनका फेंकते हुए कहा। इसे जला कर दिखाओ तो मैं मानु की तुम में बहुत ताक़त है।

अग्निदेव ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी। वो जितना कर सकते थे किया। लेकिन वो उस तिनके को नहीं जला पाए। अंत में जब वो उस तिनके को नहीं जला पाए तो वो हार मानकर वापस देवताओं के पास आ गए। और कहा की पता नहीं कौन है?

तब देवताओं ने वायुदेव को यक्ष के पास भेजा। की वो पता लगाकर आयें की आखिर ये यक्ष कौन है?

जब वायुदेव यक्ष के पास गए तो यक्ष से भी पूछा की आखिर वो कौन है? इस पर वायुदेव ने कहा मुझे लोग वायुदेव कहते हैं। क्या तुम नहीं जानते की वायुदेव कौन है? वायुदेवता को अपने बल पर बहुत घमंड था।

इस पर यक्ष ने वापस पूछा की वो सब तो ठीक है। लेकिन तुम कर क्या सकते हो? तुममे कितनी ताक़त है।

इस पर वायुदेव ने कहा। मुझमे इतनी ताक़त है की फूंक मार कर पूरे ब्रम्हांड को उड़ा सकता हूँ।

इस बात को सुनकर यक्ष ने कहा की मैं तुम्हारे सामने इस तिनके को रखता हूँ। अगर तुम इतने ही ताक़तवर हो तो इस तिनके को उड़ा कर दिखाओ। तो मैं मानु की तुममे ताकत है।

वायुदेव ने सोचा की एक तिनका ही तो है। अभी उडा दूंगा। ये सोचकर उन्होंने हल्की सी फूंक मारी। पर तिनका थोडा भी नहीं हिला। फिर उन्होंने अपनी पूरी ताक़त लगा दी। लेकिन तिनका थोडा भी नहीं हिला। 

तिनके के ऐसे प्रभाव को देखकर वायुदेव का घमंड भी चूर चूर हो गया। और वो शर्मिंदा होकर वापस देवताओं के पास लौट आये।

देवराज इंद्र ने वायुदेव से पूछा पता चला की ये यक्ष कौन है? इस पर वायुदेव बोले पता नहीं कौन है। लेकिन इसके फेंके तिनके को मैं हिला तक न सका।

इंद्र को भी बड़ा अचम्भा लगा। अब वो खुद यक्ष के पास उनका परिचय लेने गए। लेकिन तभी यक्ष गायब हो गए। अब तो इंद्र को और भी आश्चर्य हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है की कोई इस तरह गायब हो जाए।

सच्चाई ये थी की सभी देवताओं में सबसे ज्यादा घमंड इंद्र को था। इसलिए ब्रम्हाजी उससे सीधे मुह बात तक नहीं करना चाहते थे। इसलिए वो गायब हो गए।

इंद्र देव बहुत निराश हुए। लेकिन उन्होंने यह पता करना शुरू कर दिया की आखिर ये कौन था? उन्होंने यक्ष का पीछा किया।

 जब इंद्र आकाश में जा रहे थे तो उन्हें रास्ते में देवी भगवती मिलीं। उन्होंने देवी भगवती को पहचान लिया। और प्रणाम करके पूछा की देवी वो यक्ष कौन था। 

देवी ने मुस्कुराकर कहा जो अग्निदेव और वायुदेव को हरा दे वो कौन हो सकता है? अथार्त वो ब्रम्हाजी थे। उन्होंने देवताओं के घमंड को ख़त्म करने के लिए ही यक्ष का रूप रखा था।

असलियत जानने के बाद इंद्र का घमंड भी ख़त्म हो गया। और वो सभी देवताओं के साथ मिलकर ब्रम्हाजी की पूजा करने लगे।

शिक्षा- हमे किसी के उपकार को नहीं भूलना चाहिए। और न शक्ति मिलने पर घमंड करना चाहिए। और न ही सोचना चाहिए की हम ही सबसे महान हैं।


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Story No. 4 Moral Stories In Hindi For Students

सत्यकाम जाबाल


ये कहानी छान्दोग्योपनिषद से ली गयी है और Moral Stories In Hindi For Students के रूप में संग्रहित की गई है।


कहते हैं कि शिक्षा सबका अधिकार है। लेकिन जैसे आज के ज़माने में जब कोई विद्यालय में नाम लिखवाने जाता है तो उसका नाम, माता का नाम, पिता का नाम और पता आदि पूछा जाता है। वैसे ही पहले के ज़माने में कुछ बातें पूछी जाती थीं। जिनका उत्तर दिए बिना गुरु शिष्य को ज्ञान नहीं देते थे। 

तो आज हम ऐसी ही एक कहानी की बात करेंगे। और सीखेंगे की किसी भी विद्यार्थी के अन्दर विद्या ग्रहण करने के लिए कौन कौन से गुण होने चाहिए और एक विद्यार्थी को कैसा होना चाहिए। 

बहुत समय पहले की बात है। एक जबाला नाम की औरत थी। वो औरत बहुत ही अच्छे व्यवहार की थी। उसका एक बेटा था जिसका नाम सत्यकाम था।

 वह लड़का भी बहुत होनहार था। जो उसकी माँ उसे सिखाती वो उसे बहुत ही जल्दी से सीख जाता था। जबाला अपने पुत्र सत्यकाम से बहुत प्यार करती थी।

सत्यकाम धीरे धीरे जब बड़ा हो गया। और उसने देखा की उसके सभी मित्र गुरुकुल को पढ़ाई के लिए जा चुके हैं। तो उसके मन में भी इच्छा हुई की वो भी गुरुकुल जाकर पढ़ाई करे।

 उसने अपनी माँ से कहा माँ मै भी अपने दोस्तों की तरह गुरुकुल जाकर पढाई करना चाहता हूँ। 

माँ ने आज्ञा दे दी। 

जब सत्यकाम गुरुकुल जाने के लिए तैयार होने लगा तो उसे याद आया की उसके मित्र बता रहे थे की जब वो पहली बार गुरुकुल गए थे तो उनसे उनका गोत्र पूछा गया था। और तभी जाकर गुरुजी ने शिक्षा देना शुरू किया था। 

सत्यकाम को याद आया की उसे तो पता ही नहीं है की उसका गोत्र क्या है।

 उसने अपनी माँ से कहा। माँ जब मै गुरुकुल जाऊँगा तो वहां गुरूजी मुझसे मेरा गोत्र पूछेंगे। तो मै उनको क्या जवाब दूंगा? क्योंकि मुझे तो मेरा गोत्र नहीं पता है। मुझे नहीं पता की मै किस गोत्र का हूँ? आपने मुझे इस बारे में मुझे कभी कुछ बताया ही नहीं। इसलिए अब मुझे मेरा गोत्र बताने की कृपा करें।

जबाला इस बात को सुनकर चुप हो गयी। उसके पास इस बात का कोई भी जवाब नहीं था। क्योंकि उसे खुद नहीं पता था की सत्यकाम का गोत्र क्या है। गोत्र के बारे में उसे पता भी कैसे होता? उसने कभी अपने पति से गोत्र पूछा ही नहीं। सत्यकाम से कहने के लिए जबाला के पास कोई भी जवाब नहीं था।

थोड़ी देर शांत रहने के बाद जबाला ने सत्यकाम से कहा। जब मै जवान थी तो तुम हमारे घर में जन्म लिए।

 हमारे घर में हर दिन नए लोगो का आना लगा रहता था, जिससे तुम्हारे पिताजी और मै उन अतिथि लोगो के कारण बहुत व्यस्त रहते थे।

 और तो और उनका काम ऐसा था की वो घर पर बहुत कम ही रहते थे। और जब रहते थे तो अतिथि लोगो के साथ व्यस्त रहते थे। इसलिए उनसे कभी गोत्र पूछने का वक़्त ही नहीं मिला और न ही उन्होंने बताया। 

तुम्हारे पैदा होने के कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गयी। इसलिए मै कभी उनसे गोत्र नहीं पूछ पायी।

 मैंने कई बार सोचा की किसी और से पूछूं। लेकिन तुम्हारे पिता के मृत्यु से मै इतनी दुखी थी की किसी और से भी गोत्र नहीं पूछ पायी। इसलिए पुत्र मुझे नही पता की तुम्हारा गोत्र कौनसा है? 

मुझे तो बस इतनी बात पता है की मै जबाला हूँ। और तुम सत्यकाम। इसलिए जब गुरूजी तुमसे पूछे की तुम्हारा गोत्र क्या है। तो उन्हें ये सारी बात बता देना। और कह देना की मेरी माँ का नाम जबाला और मेरा नाम सत्यकाम है। बस मै इतना ही जानता हूँ।

ये बात जानकर सत्यकाम गुरुकुल के लिए निकल गया। काफी जंगलो को पार करते हुए वो आखिर उन गुरूजी के आश्रम में पहुँच गया जहाँ वो पहुंचना चाहता था। वो आश्रम था हारिद्रुमत गौतम ऋषि का।

 वहां पहुँचकर सत्यकाम ने सबसे पहले गुरूजी को प्रणाम किया और फिर अपनी बात कही। वो उनके पास रहकर शिक्षा ग्रहण करना चाहता है। 

जैसा की सत्यकाम के मित्रो ने बताया था की ज्ञान देने से पहले गुरूजी गोत्र पूछते हैं। वैसा ही हुआ। गुरूजी ने सत्यकाम से उसका गोत्र पूछा।

सत्यकाम ने कहा। ऋषिवर मुझे मेरा गोत्र नहीं पता। मेरे पिता मेरे पैदा होने के कुछ दिन बाद ही मर गए थे। और मुझे मेरी माँ ने ही पाला पोसा है।

 जब मैंने उनसे गोत्र के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा की उन्होंने कभी मेरे  पिताजी से इस बारे में बात नहीं की। इसलिए उन्हें गोत्र के बारे में कुछ भी पता नहीं है। 

मेरी माँ ने कहा की जब गुरूजी गोत्र पूछेंगे तो ये बात बता देना। और कह देना की मुझे सिर्फ इतना पता है की मेरा नाम सत्यकाम और मेरी माँ का नाम जबाला है। बस मुझे इससे ज्यादा कुछ नहीं पता है।

ऋषि गौतम इस बात से बड़े खुश हुए की वो साफ़ साफ़ और सत्य बोलता है। वो सत्यकाम के इस व्यवहार से बहुत खुश हुए। 

ऋषि गौतम ने सत्यकाम से मुस्कान के साथ कहा। तुम्हारी बात और व्यवहार से तुम ब्राह्मण लगते हो। मुझे पूरा विश्वास है की तुम ब्राह्मण के ही पुत्र हो। ज्ञान प्राप्त करने से पहले ज़रूरी है की तुम्हारा उपनयन संस्कार ( जनेऊ) हुआ हो। इसलिए सबसे पहले मै तुम्हारा उपनयन संस्कार करूँगा।

ऋषि गौतम ने सत्यकाम का अच्छे से उपनयन संस्कार किया। और फिर अपनी गौशाला में ले गए। और सत्यकाम को 400 बहुत ही कमजोर गायें दी और कहा की इन्हें तुम जंगल में ले जाओ। इनका पालन पोषण करो और तब इन्हें वापस लेकर आना जब इनकी संख्या 1000 हो जाए।





सत्यकाम इस बात से बहुत खुश हुआ। वह अपने गुरु की आज्ञा मान कर उन गायों को लेकर जंगल की तरफ चल दिया। 

थोड़ी दूर जाने के बाद एक अच्छी जगह देखकर सत्यकाम ने अपनी कुटिया बनाई। और वहीँ वह उन गायों के साथ रहने लगा। वह बहुत ही मन लगाकर सभी गायों की सेवा करता था। और खुद फल खाकर अपनी जिंदगी का निर्वाह कर रहा था।

 धीरे धीरे समय बीतता गया और उन गायों की संख्या बढ़कर एक हज़ार हो गयी। इस बीच एक साल का समय बीत चुका था।

जब उनकी संख्या एक हज़ार हो गयी। एक दिन सांड बोला सत्यकाम हमारी संख्या अब एक हज़ार हो चुकी है। 

अब तुम हमे गुरु के आश्रम में ले चलो। सत्यकाम तुमने हमारी सेवा बहुत ही मन से की है। और तो और तुमने हमारे लिए बहुत मेहनत किया है।

 तुमने हमारे लिए बहुत दुःख भी सहे। लेकिन कभी हम पर कोई दुःख नही आने दिया। मै तुम्हारी सेवा से बहुत खुश हूँ ।और मै तुम्हे ब्रम्हाजी के एक पाद चरण का एक उपदेश देना चाहता हूँ।

इसके बाद सांड ने सत्यकाम को उपदेश देना शुरू किया और कहा। सत्यकाम ब्रम्हाजी के चार पाद हैं।

 उनमें से एक है प्रकाशवान। जो प्रकाश चारो तरफ फैला हुआ है वो सब ब्रम्हाजी की ही देन है। ये सब प्रकाशवान की वजह से ही प्रकाश पाते हैं। जो कोई इस प्रकाश का ध्यान करता है। उसे प्रकाशवान लोक की प्राप्ति होती है। 

मैंने तुम्हे ब्रम्हाजी के पहले पाद का ज्ञान दिया है। अभी तुम्हे तीन और पाद का ज्ञान लेना होगा। दूसरे पाद का ज्ञान तुम्हे अग्निदेव देंगे। इस बात के साथ ही सांड चुप हो गया।

सत्यकाम इस बात को जानकार सभी गायों को लेकर गुरूजी के आश्रम की तरफ चल दिया। आश्रम जंगल से काफी दूर था। और एक दिन में यात्रा करना संभव नहीं था। 

चलते चलते शाम हो गयी और आश्रम अभी काफी दूर था। सत्यकाम ने एक उचित जगह देखकर उन गायों को बाँध दिया और खुद एक किनारे आग जलाकर बैठ गया। उसे बैठे बैठे सांड की बात की याद आई। और सत्यकाम ने अग्निदेव का ध्यान करना शुरू कर दिया।

 थोड़ी देर बार अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने सत्यकाम को ब्रम्हाजी का दूसरा पाद बताया।

 दूसरा पाद बताते हुए अग्निदेव ने कहा। हे सत्यकाम! ब्रम्हाजी का दूसरा पाद अनंत्वान है। यानी की ब्रम्हाजी अनंत हैं। वो हर जगह उपस्थित हैं। धरती आकाश इंसान सब में ब्रम्हाजी उपस्थित हैं। जो ब्रम्हाजी के इस पाद का ध्यान करता है, उसे अनंत काल तक सुख प्राप्त होता है। 

अब तुमने ब्रम्हाजी के दो पादों के बारे में ज्ञान प्राप्त कर लिया है। अगले पाद के बारे में तुम्हे हंस से पता चलेगा। इतनी बात कहकर अग्निदेव गायब हो गए। 

सत्यकाम इस ज्ञान को पाकर सो गया। जब सुबह हुई तो जल्दी ही उठकर सभी गायों को लेकर आश्रम की तरफ चल दिया।

रास्ते में सत्यकाम को एक हंस मिला। जिसने कहा की मै तुम्हे ब्रम्हाजी के तीसरे पाद का ज्ञान दूंगा। आगे हंस ने कहना शुरू किया। ब्रम्हा का तीसरा पाद ज्योष्मान है।

 यानी की पूरे संसार में जो भी वस्तु ज्योति (प्रकाश) देती है। वो सब ब्रम्हाजी ने ही बनाया है। जो कोई ब्रम्हाजी के इस पाद का ध्यान करता है, उसे अग्नि सूर्य या चन्द्र लोक में स्थान मिलता है।

हे शिष्य तुम्हे चौथे पाद का ज्ञान एक जलमुर्ग से मिलेगा। इतना कहकर हंस उड़ गया।

अगले दिन फिर जब सत्यकाम आश्रम की तरफ जा रहा था, तो रास्ते में एक नदी मिली। जिसमे एक जलमुर्ग था। उसे देखकर सत्यकाम रुक गया।

 जलमुर्ग ने पास आकर कहना शुरू किया। सत्यकाम मै तुम्हे ब्रम्हाजी के चौथे और आखिरी पाद का ज्ञान दूंगा। ध्यान से इसको सुनना। ब्रम्हा का चौथा पाद आयतवान है। यह पाद आँख, कान, मन, प्राण में समाया हुआ है। जो ब्रम्हाजी के इस पाद का ध्यान करता है, उसे ब्रम्हाजी की शरण मिलती है। 

इस तरह से सांड के रूप में वायुदेव, अग्निदेव ,हंसरूप में सूर्यदेव और जलमुर्ग के रूप में प्राणदेवता से ब्रम्हाजी का ज्ञान प्राप्त किया। अंत में एक हज़ार गायों के साथ ऋषि गौतम के आश्रम में पहुंचा। उसे वहां वापस आया देख कर ऋषि को बड़ी ख़ुशी हुई।

सत्यकाम के चेहरे से साफ़ पता चल रहा था की उसने जीवन सबसे मुख्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। ऋषि गौतम ने तुरंत सत्यकाम से पूछा की तुम्हारे चेहरे से साफ़ पता चल रहा है की तुमने काफी ज्ञान अर्जन किया है। बताओ ये ज्ञान तुम्हे किसने दिया है?

सत्यकाम ने ऋषि गौतम को प्रणाम किया और पूरी कहानी कह सुनाई।

सत्यकाम की बात सुनकर गुरूजी ने कहा। सत्यकाम! अब तुम्हे किसी तरह के ज्ञान की ज़रुरत नहीं है। अब तुमने पूरी तरह से ज्ञान प्राप्त कर लिया है।

इस बात पर सत्यकाम ने कहा। गुरूजी शायद मुझे अब किसी और ज्ञान की ज़रुरत न हो। लेकिन दुनिया में गुरु से मिला ज्ञान ही सबसे श्रेष्ठ होता है। और मेरे गुरु आप हैं इसलिए मै चाहता हूँ की मुझे आप ही ज्ञान दें।

सत्यकाम की इस बात से गुरूजी काफी खुश हुए और उसे अपने पास रखकर उसी ज्ञान को और अच्छे से समझाया।

शिक्षा - जिस तरह से सत्यकाम ने सत्य गुरु की सेवा और गौसेवा करके ज्ञान प्राप्त किया। वैसे ही हमे भी सत्य और सेवा का प्रण लेना चाहिए, तो ही हमारा कल्याण हो पायेगा।


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Story No. 5 Moral Stories In Hindi For Students 

आचार्य सत्यकाम


ये कहानी छान्दोग्योपनिषद से ली गयी है और Moral Stories In Hindi For Students के रूप में संग्रहित की गई है।


हमने पहले ही 'सत्यकाम जाबाल' कहानी में पढ़ लिया है की उसने कैसे गौतम ऋषि से ब्रम्हज्ञान का ज्ञान प्राप्त किया था। आज हम इस कहानी में पढेंगे जब वही सत्यकाम खुद गुरु बना तो लोगो को कैसे शिक्षा दे रहा है।

सत्यकाम अपने शिष्यों को हमेशा ज्ञान की बातें बताया करते थे। और बताया करते थे की कैसे उन्होंने खुद ज्ञान प्राप्त किया। 

उनके शिष्यों में एक शिष्य उपकोसल था। उपकोसल भी अन्य शिष्यों की तरह अग्नियों की सेवा करता था और शिक्षा प्राप्त करता था। 

ऐसा करते करते उसे 12 साल बीत चुके थे। जब 12 साल बाद शिक्षा पूरी हो गयी तो सत्यकाम ने सभी शिष्यों का दीक्षांत संस्कार किया और उन्हें घर जाने को कहा। लेकिन उपकोसल का दीक्षांत संस्कार नहीं किया और उसे आश्रम में ही रुकने को कहा। 

उपकोसल को इस बात का बहुत बुरा लगा। क्योंकि उसकी भी तो पढाई पूरी हो गयी थी। लेकिन उसे घर जाने की आज्ञा क्यों नहीं मिली?

 वो रोते हुए सभी बच्चो को वापस अपने घर जाते देख रहा था। वो अपने गुरु से बहुत गुस्सा हो गया। उसने निर्णय लिए की अब वो अनशन करेगा। अब वो तब तक कुछ नहीं खायेगा, जब तक उसे ब्रम्हज्ञान का ज्ञान नहीं मिल जाता। 

गुरुपत्नी (सत्यकाम की पत्नी) उपकोसल के इस दुःख को समझ गयी। उन्होंने सत्यकाम से कहा। प्रभो! उपकोसल ने भी तो ब्रम्हचर्य का पालन वैसे ही किया है, जैसे सभी लोगो ने किया है। फिर आपने इसे क्यों ब्रम्हज्ञान नहीं दिया? क्यों नहीं आप इसे भी ब्रम्हज्ञान देकर दीक्षांत संस्कार कर देते? 

आचार्य सत्यकाम ने अपनी पत्नी की बात पर थोडा भी ध्यान नहीं दिया। और बिना कुछ बोले अपने काम पर निकल गए।

आचार्य तो अपने काम पर चले गए। लेकिन इधर उपकोसल ने खाना पीना छोड़ दिया। गुरुपत्नी ने बहुत समझाया लेकिन वो अपनी बात पर अडा रहा। उसने कहा की जब तक उसे ब्रम्हज्ञान नहीं मिल जाता वो कुछ नहीं खायेगा। 

जब अग्नियों ने देखा की उपकोसल ने ऐसा किया है , तो उन्होंने सोचा की इसने 12 साल हमारी सेवा की है। इसलिए हम भी तो इसको वो ज्ञान दे सकते हैं, जो इसके गुरु नहीं दे रहे हैं। यानी की हम भी तो इसे ब्रम्हज्ञान दे सकते हैं। 

अग्नियों ने उपकोसल को ब्रम्हज्ञान देना शुरू किया। उन्होंने कहा हे प्रिय! प्राण ही ब्रम्हा है। पृथ्वी ही ब्रम्हा है। जल ही ब्रम्हा है।

घर में जलने वाली अग्नि ने कहा। हे प्रिय! पृथ्वी, अन्न, सूर्य, अग्नि मेरे ही चार रूप हैं।

पितृलोक की अग्नि ने कहा। हे प्रिय! दिशा, नक्षत्र, चन्द्रमा, जल मेरे ही चार रूप हैं।

विद्दुत अग्नि ने कहा। हे उपकोसल! आकाश, विद्दुत, द्दुलोक और प्राण मेरे ही चार रूप हैं।

इतना ज्ञान देने के बाद अग्नियों ने कहा की हम तुमको इतना ही ज्ञान दे सकते हैं। बाकी का ज्ञान तुम्हे तुम्हारे गुरुश्रेष्ठ ही देंगे।



उपकोसल इस ज्ञान को पाकर उसका मनन करने लगा। दिन बीतते गए और आखिर कुछ दिनों के बार आचार्य सत्यकाम वापस लौट आये। उन्होंने आते ही उपकोसल को बुलाया।

उपकोसल जब सामने आया, तो उसे देखकर ही सत्यकाम समझ गए की इसे ब्रम्हज्ञान मिल चुका है। और वो ये अच्छी तरह जानते थे की उपकोसल को ये ज्ञान अग्नियों ने दिया है। 

आचार्य ने उससे उस ज्ञान के बारे में पूछा जो उसने प्राप्त किया था। उपकोसल ने वो बात वैसे की वैसे ही बता दी जैसे उसे अग्नियों ने बताया था।

आचार्य ने पूरी बात सुनी और कहा की ये ज्ञान लोक सम्बन्धी हैं। पूरे ब्रम्हज्ञान के बारे में मैं तुम्हे बताऊंगा।

इसके बाद आचार्य ने उपकोसल को असली ब्रम्हज्ञान देते हुए कहा। असली ब्रम्हज्ञान जिसे मिल जाता है उसे पाप उसी तरह छू नहीं सकता जैसे जल में होने के बाद भी कमल की पंखुड़ियों पर जल नहीं टिकता। अगर छू भी जाता है तो थोड़ी देर में ही ख़त्म हो जाता है।

पूरी तरह ब्रम्हज्ञान देने के बाद आचार्य ने उपकोसल का दीक्षांत संस्कार किया। और उसे वापस घर जाने की आज्ञा दी।

शिक्षा - गुरु किसी कार्य को करने के लिए मना कर रहे हैं तो उसके पीछे कोई वजह ज़रूर होगी। हमे बिना सवाल किये उनकी बात को मान लेना चाहिए। और धैर्य रखे रहना चाहिए। सही समय आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।


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Story No. 6 Moral Stories In Hindi For Students

गाड़ीवाला ज्ञानी


ये कहानी छान्दोग्योपनिषद से ली गयी है और Moral Stories In Hindi For Students के रूप में संग्रहित की गई है।


महावृष देश के राजा जानश्रुति थे। वो बहुत ही अच्छे राजा थे।

 वो अपनी प्रजा का बहुत अच्छे से ख्याल रखते थे। वो अपने देश में आये हुए अतिथि लोगो का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने प्रजा के लिए वो सब किया था जो प्रजा के लिए ज़रूरी हो। 

उन्होंने जगह जगह धर्मशालायें, चिकित्सालय, शिक्षाकेन्द्र आदि बनवाये। जो की प्रजा के लिए बहुत ज़रूरी थे। वो एक अच्छे राजा होने के साथ साथ बहुत ज्ञानी भी थे।

 वो इतने अच्छे और ज्ञानी थे की देवता तक उनके तेज़ से डरते थे। की कहीं उनके तेज़ से वो जल न जाए। इसलिए वो राजा जानश्रुति के पास से नहीं गुजरते थे। राजा वैसे तो बहुत ज्ञानी थे फिर भी उन्हें ब्रम्हज्ञान नहीं प्राप्त था।

एक दिन की बात है। राजा शाम के समय अपने छत पर टहल रहे थे। और अपनी प्रजा के बारे में सोच रहे थे।

 तभी उन्होंने देखा की दो हंस अपने घर को वापस जा रहे थे। वो दोनो आपस में बात कर रहे थे। एक हंस ने कहा की देखना थोडा बचा कर उड़ना कहीं ऐसा न हो की हम राजाजी के तेज़ से जल जाएँ। राजा का तेज़ बहुत ज्यादा है।

दूसरे हंस ने कहा अरे! राजा का क्या तेज़ है? इससे ज्यादा तेज़ तो गाडी वाले रैक्व का है। तुमने उसका तेज़ देखा है क्या? ये बात करते करते दोनो हंस अपने घर की तरफ उड़ चले।

वो दोनों हंस तो अपने घर को चले गए। लेकिन राजा के मन में वो बात घूमती रही। वो इसी बारे में सोचने लगे की हंस ने उसका अपमान किया है। 

राजा पूरी रात रैक्व के बारे में सोचते रहे। वो सोचते रहे की उसका तेज़ कितना होगा आखिर? वो कितना ज्ञानी होगा? यही सब सोचते सोचते सुबह हो गयी और राजा को पूरी रात नीद नहीं आई।

राजा ने सुबह होते ही सैनिको को रैक्व की खोज करने के लिए भेज दिया। और कहा की रैक्व से कहना की राजा ने मिलने के लिए बुलाया है। 

सैनिको ने पूरे दिन रैक्व को पूरे राज्य में खोजा। लेकिन वो कहीं नहीं मिला। शाम को सैनिको ने राजा के पास पहुंच कर कहा। महाराज हमने पूरे राज्य में रैक्व को खोजा लेकिन वो कहीं नहीं मिला।

राजा ने कहा की ऐसे बड़े और ज्ञानी लोग सबके बीच नहीं मिलते हैं। वो कहीं अलग रहते हैं। तुम उन्हें जंगल में जाकर खोजो वो तुम्हे मिल जायेंगे। 

अगले दिन सैनिको ने जंगल में रैक्व को खोजना शुरू किया। काफी खोजने के बाद सैनिको ने देखा की एक इंसान गंदे कपडे पहने एक गाडी के नीचे बैठा हुआ है। 

सैनिको ने उससे जाकर पूछा। क्या तुम्ही गाड़ीवाले रैक्व हो? उसने कहा की हाँ मै ही हूँ। सैनिको ने कहा की चलो तुम्हे राजा ने मिलने के लिए बुलाया है। वो तुमसे मिलना चाहते हैं।

इस बात को सुनकर रैक्व ने कहा। राजा जब मिलना चाहते हैं तो मुझसे यहीं आकर मिलें।

सैनिको ने ये बात राजा से जाकर कही। राजा अच्छी तरह जानते थे की वो महाज्ञानी हैं। इसलिए राजा अगले दिन रैक्व से मिलने के लिए निकल दिए। राजा ने रैक्व के लिए ढेर सारा धन, हाथी, घोड़े उपहार स्वरुप ले लिए। 

राजा रैक्व के पास पहुंचे और कहा। हे महाज्ञानी! मुझे आप ब्रम्हज्ञान दें और उसके बदले में ये सभी आप रख लें।

रैक्व ने जब ये सुना तो गुस्सा हो गया और कहा। रे तुच्छ! तू इन बेकार की वस्तुओ के बदले ब्रम्हज्ञान चाहता है। चला जा यहाँ से। 

राजा को बहुत अपमानित महसूस हुआ। साथ ही साथ उन्हें एहसास हुआ। उन्होंने क्या गलती की है। उन्हें तब समझ में आया की ब्रम्हज्ञानी को दुनिया की किसी वस्तु से प्रेम नहीं होता है। और वो ज्ञान लेने गये थे पर उनकी बात में अभिमान था। जिसकी वजह से रैक्व ने उन्हें ज्ञान देने से मना कर दिया।

अगले दिन फिर राजा रैक्व से मिलने के लिए निकले। इस बार वो पहले से ज्याद धन लेकर गए और साथ में अपनी बहन को भी लेकर गए।

 राजा रैक्व के पास पहुँचते ही उसके पैरो में गिर गए और कहा। हे महाज्ञानी! ये मेरी बहन है। आप कृपा करके इससे विवाह कर लें और उपहार स्वरुप इस धन को स्वीकार करें। और साथ ही साथ ये जमीन जिस पर आप हैं वो भी आपकी। मै चाहता हूँ की एक रिश्तेदार होने की वजह से मुझे ज्ञान देने की कृपा करें।

 रैक्व ने देखा की राजा के आँखों में थोडा भी अभिमान नहीं है। और ये सच में उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए उतावला है। और वो इसके लायक भी है। 

रैक्व ने ब्रम्हज्ञान देते हुए कहा। हे शिष्य! सुनो तुम वायु की ब्रम्हा रूप में साधना करो। क्योंकि वायु में ही सब समाया हुआ है। 

आग शांत होने के बाद वायु में समा जाती है। जल वाष्प बनने के बाद वायु में छिप जाती है। मनुष्य में जीवन भी वायु की वजह से है। जब कोई मर जाता है तो भी उसका शरीर वायु में विलीन हो जाता है। जब हम सोते हैं तो नेत्र कान मन सब वायु के सहारे ही कार्य करते हैं। इसलिए तुम वायु का ध्यान करो। 

ब्रम्हज्ञान पाकर राजा बहुत खुश हुए और अपने महल को वापस आ गए।

शिक्षा - ज्ञान अगर छोटे इंसान के भी पास हो तो भी उसे ले लेना चाहिए। यानी की उसे गुरु बना लेना चाहिए।


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